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  • 🌕 शरद पूर्णिमा 2025: महत्व, व्रत कथा और खास बातें /अश्विन पूर्णिमा भी कहा जाता हैं /कोजागिरी पूर्णिमा भी कहा जाता हैं!

    शरद पूर्णिमा हिंदू धर्म का एक अत्यंत पावन और विशेष पर्व है। यह दिन आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। शास्त्रों में मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन की गोपियों के साथ महानंदमयी महारास किया था। इस बार इसे 6 अक्टूबर को मनाया जाएगा!

    🪔 शरद पूर्णिमा का महत्व

    इस दिन चंद्रमा की किरणों में विशेष अमृत तत्व होता है।ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अपनी चांदनी से धरती पर अमृत वर्षा करता है।आयुर्वेद के अनुसार, इस रात को चांदनी में रखा दूध पीने से शरीर को रोगों से मुक्ति मिलती है और यह बेहद पौष्टिक होता है।यह दिन मां लक्ष्मी की पूजा और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उत्तम माना जाता है।

    🙏 शरद पूर्णिमा की पूजा विधि

    1. प्रातः स्नान करके घर में शुद्ध वातावरण बनाएं।

    2. मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा करें।

    3. व्रत रखने वाले पूरे दिन फलाहार करते हैं।

    4. रात को दूध में चावल डालकर खीर बनाई जाती है।

    5. इस खीर को चांदनी रात में खुले आकाश के नीचे रखा जाता है और अगली सुबह प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

    🌸 शरद पूर्णिमा व्रत कथा

    एक पौराणिक कथा के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात जो व्यक्ति जागरण करता है, मां लक्ष्मी स्वयं उसके घर आती हैं और आशीर्वाद देकर दरिद्रता दूर करती हैं। इसी कारण इसे कोजागरी पूर्णिमा कहा जाता है, जिसका अर्थ है – “कौन जाग रहा है?”

    ✅ शरद पूर्णिमा से जुड़े उपाय

    इस दिन लक्ष्मी पूजन करने से घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है।चंद्रमा को अर्घ्य देकर मनोकामना पूरी की जा सकती है।जरूरतमंदों को भोजन व वस्त्र दान करने से पुण्य मिलता है।

    📌 निष्कर्ष

    शरद पूर्णिमा 2025 का पर्व भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। यह दिन स्वास्थ्य, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है। चांदनी रात में खीर का सेवन और मां लक्ष्मी की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है।👉 इस शरद पूर्णिमा पर व्रत रखें, दान करें और चंद्रमा की अमृतमयी चांदनी का लाभ उठाएं।

  • रावण: ब्राह्मण-राक्षस का जीवन, शिव भक्ति और सीता हरण की कथा / किसके लिए हुआ सीता अपरहण/ कौन है रावण का सौतेला भाई / चलिए जानते है??

    रावण, रामायण का सबसे प्रसिद्ध राक्षस राजा, एक जटिल और बहुआयामी व्यक्तित्व था। वह शक्ति, विद्या और भक्ति का अद्भुत संगम था।

    रावण का जन्म और वंश

    रावण का जन्म विश्रवा ऋषि और कैकेसी के घर हुआ था। इस प्रकार वह ब्राह्मण वंश और राक्षस वंश दोनों से संबंधित था, इसलिए उसे “ब्रह्मण-राक्षस” कहा जाता है।

    रावण और कुबेर: सौतेले भाई

    रावण और कुबेर का रिश्ता भी काफी रोचक है। दोनों ही विश्रवा ऋषि के पुत्र थे।रावण का राक्षस पक्ष था औरकुबेर का दिव्य पक्ष।कुबेर धन और वैभव के देवता माने जाते हैं। पौराणिक कथाओं में, रावण ने कभी-कभी कुबेर के स्वर्ग और वैभव पर विजय पाने की कोशिश की, लेकिन कुबेर सुरक्षित रहे।

    रावण और शिव भक्ति

    रावण भगवान शिव का अत्यंत बड़ा भक्त था। उसकी भक्ति इतनी गहरी थी कि उसने शिव तांडव स्तोत्र की रचना की। कहा जाता है कि रावण ने अपने दस सिर और बीस हाथों से यह स्तोत्र उच्चारित किया। इस स्तोत्र में शिव के तांडव नृत्य, उनकी शक्ति और वैभव का वर्णन है।

    रावण की बहन शूर्पणखा

    रावण की बहन शूर्पणखा बहुत सुंदर और महत्वाकांक्षी थी। राम और लक्ष्मण से उसका विवाद हुआ। शूर्पणखा ने सीता पर हमला किया, लेकिन लक्ष्मण ने उसका नाक और कान काट दिए।इस अपमान का बदला लेने के लिए रावण ने ठान लिया कि वह सीता का हरण करेगा।

    सीता हरण की कथा

    रावण ने सीता हरण की योजना बड़े चालाकी से बनाई:1. मायावी रूप धारण कर सीता को भ्रमित किया।2. राम और लक्ष्मण को अलग कर दिया।3. सीता अकेली होने पर पुष्पक विमान में उसे लंका ले गया।यह कृत्य रामायण के युद्ध का मुख्य कारण बन गया।—रावण का व्यक्तित्व अत्यंत जटिल था:एक ओर वह शिव भक्त और विद्वान ब्राह्मण था,तो दूसरी ओर वह लंका का शक्तिशाली राक्षस राजा और सीता हरणकर्ता भी।उसकी कहानी हमें भक्ति, शक्ति और अहंकार के महत्व और परिणामों की महत्वपूर्ण सीख देती है।

  • लंका दहन: कौन है जिसने, कैसे और क्यों लगाई रावण की लंका में आग चलिए जानते है ???

    रामायण की कथा में लंका दहन (Lanka Dahan) का प्रसंग सबसे रोमांचक और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह प्रसंग न केवल भगवान राम की लीला को आगे बढ़ाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि असत्य और अहंकार का अंत निश्चित है।

    लंका में आग किसने लगाई?

    लंका में आग हनुमान जी ने लगाई थी।जब हनुमान जी सीता माता की खोज में लंका पहुँचे, तब उन्होंने अशोक वाटिका में माता सीता को देखा।उन्होंने सीता माता को भगवान राम का संदेश दिया और उन्हें आश्वस्त किया।इसके बाद हनुमान जी ने लंका में अपनी शक्ति दिखाते हुए कई राक्षसों का वध किया।

    हनुमान जी को कैद क्यों किया गया?

    रावण के सैनिकों ने हनुमान जी को पकड़कर रावण के दरबार में पेश किया।रावण ने उनका मजाक उड़ाते हुए आदेश दिया कि उनकी पूँछ में आग लगा दी जाए।रावण सोचता था कि इससे हनुमान जी अपमानित होंगे।

    लंका में आग कैसे लगी

    जब रावण के आदेश पर हनुमान जी की पूँछ में कपड़े बाँधकर तेल डालकर आग लगाई गई, तो हनुमान जी ने अपने दिव्य स्वरूप का विस्तार कर लिया।उन्होंने अपनी जलती हुई पूँछ से पूरी लंका नगरी में उछल-कूद मचाई और देखते ही देखते सोने की नगरी लंका को जला डाला।हनुमान जी ने यह सब सीता माता के अपमान और रावण के अहंकार के प्रतिकार स्वरूप किया।

    लंका दहन क्यों हुआ?

    सीता हरण का प्रतिशोध लेने के लिए।रावण को चेतावनी देने के लिए कि अधर्म का अंत निश्चित है।भगवान राम की सेना की शक्ति का आभास कराने के लिए।ताकि पूरी लंका को अहसास हो कि राक्षसों का साम्राज्य सुरक्षित नहीं है।

    धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

    लंका दहन हमें यह सिखाता है कि –अन्याय और अहंकार का नाश अवश्य होता है।भगवान के भक्तों की शक्ति अपार होती है।धर्म और सत्य की रक्षा के लिए कभी-कभी कठोर कदम उठाने आवश्यक होते हैं।

    निष्कर्ष

    लंका में आग हनुमान जी ने लगाई थी। यह केवल एक युद्धनीति नहीं थी, बल्कि एक संदेश भी था कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, धर्म और सत्य की विजय निश्चित है।

  • रावण: लंका का दशानन, शिव भक्त , पराक्रमी लंकापति राजा और अहंकार का प्रतीक / क्यों थे रावण के दस सर / आखिर क्यों ओर किस्से मिला था रावण को श्राप

    रावण, रामायण का सबसे चर्चित पात्र, केवल खलनायक ही नहीं बल्कि महान विद्वान, पराक्रमी राजा और भगवान शिव का अनन्य भक्त भी था। उसके जीवन से हमें ज्ञान, शक्ति और भक्ति की महत्ता तो मिलती है, लेकिन साथ ही यह शिक्षा भी मिलती है कि अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है।

    रावण का जन्म और परिवार

    रावण का जन्म ऋषि विश्रवा और राक्षसी कैकेसी के पुत्र रूप में हुआ।उसके भाई कुंभकर्ण और विभीषण तथा बहन शूर्पणखा थीं।रावण का साम्राज्य स्वर्ण नगरी लंका में था, जिसे उसने अत्यंत वैभवशाली बनाया।

    रावण के दस सिर क्यों थे?

    रावण को दशानन कहा जाता है क्योंकि उसके दस सिर थे।पौराणिक मान्यता के अनुसार ये वास्तविक थे और उसे ब्रह्मा जी से वरदान में मिले थे।प्रतीकात्मक रूप में उसके दस सिर दस प्रकार की शक्तियों और विद्या का प्रतीक हैं।वहीं यह भी कहा जाता है कि ये उसके दस दोषों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, अहंकार, ईर्ष्या, असत्य, अन्याय, मत्सर) का प्रतिनिधित्व करते हैं।

    रावण किसका भक्त था?

    रावण भगवान शिव का परम भक्त था।उसने कैलाश पर्वत उठाने का प्रयास किया और शिवजी को प्रसन्न करने के लिए “शिव तांडव स्तोत्र” की रचना की।शिवजी ने उसे अनेक वरदान और शक्तियाँ प्रदान कीं।इसके अलावा रावण महाकाली और ब्रह्मा की भी उपासना करता था।

    रावण को मोक्ष क्यों नहीं मिला?

    रावण अपार ज्ञान और शक्ति के बावजूद अहंकार और अधर्म का शिकार हो गया।उसने माता सीता का हरण किया और भगवान राम को युद्ध की चुनौती दी।उसके अधर्म और पाप इतने गहरे थे कि उसे तुरंत मोक्ष नहीं मिला।अंततः भगवान राम (विष्णु के अवतार) के हाथों वध होने पर उसे मुक्ति तो मिली, लेकिन उसके पापों के कारण यह प्रक्रिया विलंबित हुई।कुछ मान्यताओं के अनुसार रावण वास्तव में जय-विजय (विष्णु के द्वारपाल) का अवतार था, जिसे श्रापवश तीन जन्मों में भगवान विष्णु के हाथों मरना ही था।

    रावण को मृत्यु का शाप किसने दिया?

    रावण को उसके अधर्म और पापों के कारण कई शाप मिले –

    1. नल-कुबेर का शाप – रंभा का अपमान करने पर नल-कुबेर ने श्राप दिया कि किसी स्त्री को जबरन छुएगा तो उसका शीश फट जाएगा।

    2. वेदवती का शाप – तपस्विनी वेदवती के अपमान पर उसने कहा कि अगले जन्म में वह उसके विनाश का कारण बनेगी (सीता के रूप में)।

    3. नंदी का शाप – कैलाश पर्वत उठाने पर उपहास उड़ाने के कारण नंदी ने शाप दिया कि वानरों के हाथों उसका विनाश होगा।

    4. विभीषण का श्राप – धर्म की अवहेलना करने और सीता माता को न लौटाने पर विभीषण ने भी उसके पतन की भविष्यवाणी की।

    रावण से मिलने वाले जीवन संदेश

    अपार ज्ञान और शक्ति भी व्यर्थ हैं यदि उनमें अहंकार जुड़ जाए।सच्चा मोक्ष केवल धर्म, विनम्रता और सत्य के मार्ग पर चलकर ही प्राप्त होता है।स्त्री का अपमान और अधर्म का मार्ग अंततः विनाश का कारण बनता है।

    निष्कर्ष

    रावण केवल रामायण का खलनायक नहीं बल्कि एक जटिल व्यक्तित्व था – विद्वान, शिवभक्त और पराक्रमी राजा। लेकिन उसका अहंकार, अधर्म और पाप उसके पतन का कारण बने। रावण की कथा हमें यह सिखाती है कि चाहे कितना भी ज्ञान और बल क्यों न हो, यदि जीवन में धर्म, विनम्रता और न्याय का पालन न हो तो अंत निश्चित ही विनाशकारी होता है।

  • विजयादशमी (दशहरा): बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व

    दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, भारत का एक प्रमुख पर्व है जो हर साल आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

    दशहरे का महत्व

    दशहरा भगवान श्रीराम द्वारा रावण पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान राम ने अहंकारी रावण का वध कर माता सीता को लंका से मुक्त कराया था। इसीलिए इस पर्व को असत्य पर सत्य की जीत और अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में मनाया जाता है।

    दशहरे की परंपराएं

    इस दिन जगह-जगह रामलीला का मंचन किया जाता है।शाम को रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता है।लोग आतिशबाजी और मेलों का आनंद लेते हैं।कई स्थानों पर यह पर्व माँ दुर्गा की विजय से भी जोड़ा जाता है, जब माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था।

    धार्मिक और सामाजिक संदेश

    दशहरा हमें यह प्रेरणा देता है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः जीत हमेशा सत्य और धर्म की ही होती है। यह पर्व लोगों को नैतिक मूल्यों, धर्म, साहस और एकता का महत्व सिखाता है।

  • शिकारी मात मंदिर मंडी: जहां नहीं माता को स्वीकार मंदिर के ऊपर छत और न ही टिकती है मंदिर पर बर्फ सबकी मुराद करती हैं पूरी वो है हिमाचल की प्रसिद्ध मां शिकारी

    हिमाचल प्रदेश की सुंदर वादियों में स्थित शिकारदेवी मंदिर श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर मंडी जिले के जनझेली घाटी में लगभग 2850 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। घने जंगलों और प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह मंदिर धार्मिक महत्व के साथ-साथ ट्रैकिंग और पर्यटन के लिए भी प्रसिद्ध है।

    शिकारदेवी मंदिर का इतिहास

    शिकारदेवी मंदिर का संबंध महाभारत काल से माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के समय यहाँ पूजा-अर्चना की थी। इस मंदिर की सबसे विशेष बात यह है कि यह बिना छत का मंदिर है। मान्यता है कि जब भी मंदिर पर छत बनाने का प्रयास किया गया, वह टिक नहीं पाई।

    धार्मिक महत्व

    माता शिकारदेवी को “शिकार की देवी” कहा जाता है। प्राचीन काल में राजा-महाराजा शिकार पर जाने से पहले यहाँ पूजा करते थे और माता से आशीर्वाद लेते थे। मंदिर में नवरात्रों के समय विशेष भीड़ रहती है और भक्त दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं।

    शिकारदेवी मंदिर तक पहुँच

    शिकारदेवी मंदिर तक पहुँचने के लिए निकटतम शहर मंडी है, जो यहाँ से लगभग 80 किलोमीटर दूर है। मंडी से जनझेली तक सड़क मार्ग है और वहाँ से लगभग 5-6 किलोमीटर का ट्रैकिंग मार्ग मंदिर तक जाता है।

    पर्यटन और प्राकृतिक सौंदर्य

    मंदिर के चारों ओर बर्फ से ढकी पर्वत चोटियाँ और हरे-भरे जंगल इसकी खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं। यहाँ से हिमालय की चोटियों का अद्भुत नज़ारा देखने को मिलता है। ट्रैकिंग और एडवेंचर प्रेमियों के लिए यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं।

    निष्कर्ष

    शिकारदेवी मंदिर हिमाचल प्रदेश का एक अनोखा धार्मिक स्थल है, जहाँ भक्तजन माता का आशीर्वाद लेने के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद भी उठा सकते हैं। यदि आप हिमाचल यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो शिकारदेवी मंदिर को अपनी यात्रा सूची में ज़रूर शामिल करें।

  • चामुंडा देवी मंदिर – शक्ति की अद्भुत नगरी

    हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत वादियों में बसा चामुंडा देवी मंदिर भक्तों के लिए आस्था और शक्ति का अद्भुत केंद्र है। यह मंदिर कांगड़ा जिले में बाणगंगा नदी के किनारे स्थित है और मां दुर्गा के शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। यहां मां चामुंडा अपने भक्तों के कष्ट दूर करके उन्हें शक्ति और साहस प्रदान करती हैं।

    चामुंडा देवी का इतिहास

    पौराणिक मान्यता है कि मां दुर्गा ने चंड और मुण्ड नामक राक्षसों का संहार यहीं पर किया था। तभी से उनका नाम चामुंडा देवी पड़ा। कहा जाता है कि यह स्थान प्राचीन काल से तप और साधना का केंद्र रहा है, जहां ऋषि-मुनि मां के ध्यान में लीन रहते थे।

    मंदिर की विशेषताएँ

    मंदिर के पास से बहती बाणगंगा नदी इसकी सुंदरता को और बढ़ा देती है।यहां श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।मंदिर परिसर में भगवान शिव की विशाल प्रतिमा भी स्थापित है।नवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष भव्य मेले का आयोजन होता है।

    चामुंडा देवी मंदिर पहुँचने का मार्ग

    चामुंडा देवी मंदिर कांगड़ा से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन पठानकोट और निकटतम हवाई अड्डा गग्गल (कांगड़ा एयरपोर्ट) है। सड़क मार्ग से भी यहां पहुंचना बेहद आसान है।

    धार्मिक महत्व

    मां चामुंडा को शक्ति, साहस और संरक्षण की देवी माना जाता है। भक्त विश्वास करते हैं कि जो भी श्रद्धा और भक्ति के साथ यहां दर्शन करता है, उसकी सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं।

    निष्कर्ष

    चामुंडा देवी मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है बल्कि हिमाचल की प्राकृतिक सुंदरता का भी अद्भुत उदाहरण है। अगर आप हिमाचल प्रदेश की यात्रा की योजना बना रहे हैं तो चामुंडा देवी मंदिर दर्शन अवश्य करें और मां की कृपा प्राप्त करें।

  • ब्रजेश्वरी देवी मंदिर – कांगड़ा की अद्भुत शक्ति पीठ

    ब्रजेश्वरी देवी मंदिर (Brajeshwari Devi Temple) हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित है और यह हिंदुओं के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह मंदिर माता पार्वती के स्तन गिरने के स्थान पर बना हुआ है, इसलिए इसे शक्तिपीठ का दर्जा प्राप्त है। यहाँ माँ ब्रजेश्वरी को शक्ति और आस्था की देवी के रूप में पूजा जाता है।

    ब्रजेश्वरी देवी मंदिर का इतिहास

    पौराणिक कथाओं के अनुसार जब माता सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में आत्मदाह कर लिया था, तब भगवान शिव ने माता के शव को उठाकर तांडव किया। उस समय भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के शरीर के अंगों को विभाजित किया। माता का स्तन इस स्थान पर गिरा और तभी से यह स्थान शक्ति पीठ कहलाया।

    महाभारत काल में पांडवों ने भी इस मंदिर का निर्माण करवाया था। बाद में कई बार आक्रमणों और भूकंप के कारण मंदिर क्षतिग्रस्त हुआ, लेकिन हर बार इसे भक्तों ने पुनः भव्य रूप में बनाया।

    मंदिर की वास्तुकला

    ब्रजेश्वरी देवी मंदिर अपनी अनोखी वास्तुकला और भव्यता के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के मुख्य द्वार पर सुंदर नक्काशी देखने को मिलती है। मंदिर के गर्भगृह में माँ ब्रजेश्वरी की मूर्ति स्थापित है, जहाँ दूर-दूर से भक्त दर्शन के लिए आते हैं।

    धार्मिक महत्व

    ब्रजेश्वरी देवी मंदिर में हर वर्ष नवरात्रों पर विशेष उत्सव आयोजित होता है। इन दिनों यहाँ लाखों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। मंदिर में विशेष रूप से घी की परत चढ़ाने की परंपरा भी है, जो माता को अर्पित की जाती है।

    कैसे पहुँचें

    स्थान: कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश

    नजदीकी रेलवे स्टेशन: पठानकोट रेलवे स्टेशन (लगभग 86 किमी)

    नजदीकी हवाई अड्डा: गग्गल एयरपोर्ट (लगभग 14 किमी)

    सड़क मार्ग: कांगड़ा शहर से यह मंदिर आसानी से पहुँचा जा सकता है।

    निष्कर्ष

    ब्रजेश्वरी देवी मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है बल्कि यह आस्था, संस्कृति और इतिहास का प्रतीक भी है। जो भी श्रद्धालु कांगड़ा आते हैं, वे माँ ब्रजेश्वरी के दर्शन किए बिना अपनी यात्रा अधूरी मानते हैं।

  • मां चिंतपूर्णी मंदिर : जहां सब चिंताओं को हर लेती हैं माता रानी / सारी परेशानियों से छुटकारा दिलाती है मां चिंतपूर्णी

    भारत में शक्ति के प्रमुख पीठों में से एक है माँ चिंतपूर्णी मंदिर, जो हिमाचल प्रदेश के ऊना ज़िले में स्थित है। यह मंदिर भक्तों के लिए आस्था और भक्ति का अद्भुत केंद्र है। मान्यता है कि यहाँ आने वाले श्रद्धालु अपनी सभी चिंताओं से मुक्त होकर सुख और शांति प्राप्त करते हैं। इसी कारण इनका नाम माँ चिंतपूर्णी पड़ा।

    🙏 माँ चिंतपूर्णी का इतिहास

    पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब देवी सती का शरीर भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से 51 हिस्सों में विभाजित हुआ, तब उनका पाँव का हिस्सा यहाँ गिरा। यही स्थान शक्ति पीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ और यहाँ माँ को चिंतपूर्णी देवी के नाम से पूजा जाने लगा।

    🌺 माँ चिंतपूर्णी का स्वरूप

    माँ चिंतपूर्णी को “चिंताओं का नाश करने वाली देवी” कहा जाता है। यहाँ देवी की प्रतिमा पिंडी रूप में विराजमान है। भक्त गहरी श्रद्धा से माता का पूजन करते हैं और अपनी मनोकामनाएँ माँ के चरणों में अर्पित करते हैं।

    🪔 माँ चिंतपूर्णी मंदिर का महत्व

    . माना जाता है कि यहाँ आने से सभी प्रकार की चिंताएँ और कष्ट दूर हो जाते हैं।

    2. भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

    3. यहाँ की यात्रा करने से जीवन में शांति और समृद्धि आती है।

    4. नवरात्रि के दौरान यहाँ लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुँचते हैं।

    📍 कैसे पहुँचें माँ चिंतपूर्णी मंदिर?

    यह मंदिर ऊना ज़िले में स्थित है।नज़दीकी रेलवे स्टेशन ऊना और अंब हैं।सड़क मार्ग से मंदिर तक पहुँचना बहुत आसान है क्योंकि यहाँ बस और टैक्सी की सुविधा उपलब्ध रहती है।

    ✨ माँ चिंतपूर्णी की आराधना विधि

    प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।माँ को लाल फूल, नारियल, चुनरी और मिठाई अर्पित करें।माता का ध्यान करते हुए अपनी मनोकामना प्रकट करें।श्रद्धा और भक्ति से पूजा करने पर माँ अवश्य प्रसन्न होती हैं।

    🌟 निष्कर्ष

    माँ चिंतपूर्णी मंदिर न केवल हिमाचल का एक प्रसिद्ध शक्ति पीठ है बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था का अनमोल प्रतीक भी है। यहाँ आकर भक्त अपने जीवन की हर चिंता और दुख से मुक्ति पाकर सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त करते हैं।

    👉 अगर आप कभी हिमाचल प्रदेश जाएँ तो माँ चिंतपूर्णी मंदिर के दर्शन अवश्य करें और माँ का आशीर्वाद प्राप्त करें।

  • 🌸 माँ सिद्धिदात्री – नवरात्रि नवमी की देवी 🌸

    नवरात्रि का नवां दिन माँ सिद्धिदात्री को समर्पित होता है। ये माँ दुर्गा का अंतिम स्वरूप मानी जाती हैं। “सिद्धिदात्री” का अर्थ है – सिद्धियाँ देने वाली देवी। माँ सिद्धिदात्री अपने भक्तों को आठों प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं और जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

    🙏 माँ सिद्धिदात्री का स्वरूप

    माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं।उनके हाथों में चक्र, गदा, शंख और कमल होता है।ये शेर पर सवार होती हैं और कभी-कभी कमल पर भी विराजमान रहती हैं।इनके मुख पर दिव्य आभा और कोमलता होती है, जो भक्तों को आकर्षित करती है।

    🌺 माँ सिद्धिदात्री की शक्ति

    पौराणिक मान्यता है कि माँ सिद्धिदात्री ने ही भगवान शिव को अर्धनारीश्वर रूप प्रदान किया था। इनके पूजन से साधक को अष्टसिद्धि (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) प्राप्त होती है।

    📖 नवमी व्रत और पूजा विधि

    1. सुबह स्नान करके माता सिद्धिदात्री का ध्यान करें।

    2. घर या मंदिर में कलश स्थापना करके दुर्गा सप्तशती का पाठ करें

    ।3. माता को लाल फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।

    4. कन्या पूजन करें और नौ कन्याओं को भोजन कराएँ।

    5. माता से सुख, शांति और सफलता की प्रार्थना करें।

    माँ सिद्धिदात्री की पूजा का महत्व

    भक्तों को सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।घर में समृद्धि और सुख-शांति का वास होता है।जीवन की सभी बाधाएँ और दुख दूर हो जाते हैं।साधक को आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान प्राप्त होता है।

    निष्कर्ष

    नवरात्रि की नवमी तिथि पर माँ सिद्धिदात्री की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। माँ सिद्धिदात्री भक्तों को सिद्धियाँ, सफलता और जीवन की हर मनोकामना पूर्ण करने की शक्ति देती हैं। जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ इनकी आराधना करता है, उसे कभी किसी भय या दुख का सामना नहीं करना पड़ता।

    👉 इस नवरात्रि, माँ सिद्धिदात्री की आराधना अवश्य करें और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को सुख, शांति और समृद्धि से भर दें।

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