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Category: Travel the World

  • माँ महागौरी: नवदुर्गा की आठवीं शक्ति नवरात्रि के आठवें दिन की देवी – मां महागौरी 🌸

    नवरात्रि के आठवें दिन माँ महागौरी की पूजा की जाती है। माँ का स्वरूप अत्यंत श्वेत, कोमल और दिव्य माना जाता है। महागौरी जी का वर्ण चंद्रमा और शंख की भाँति उज्ज्वल है। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और सिंह पर सवार रहती हैं। माँ महागौरी के चार भुजाएँ हैं – दाएँ हाथ में त्रिशूल और वरमुद्रा तथा बाएँ हाथ में डमरू और अभयमुद्रा शोभा देती हैं।

    नवरात्रि का आठवां दिन मां महागौरी की उपासना को समर्पित है। मां दुर्गा का यह रूप अपनी अद्भुत कांति, शांति और सौम्यता के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि मां महागौरी की उपासना करने से जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं और भक्तों को सुख-समृद्धि, शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

    🪔 मां महागौरी का स्वरूप

    मां महागौरी अत्यंत गौरवर्ण, श्वेत वस्त्र धारण किए हुए और चार भुजाओं वाली देवी हैं। उनके हाथों में त्रिशूल और डमरू रहता है, जबकि वे वर और अभय मुद्रा में भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। उनकी सवारी बैल (वृषभ) है, इसलिए इन्हें वृषभवाहिनी भी कहा जाता है।

    🙏 मां महागौरी की कथा

    पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव को पाने के लिए मां पार्वती ने कठोर तपस्या की थी। इस तपस्या से उनका शरीर काला हो गया। जब भगवान शिव ने उन्हें गंगाजल से स्नान कराया तो उनका रूप अत्यंत गौरवर्ण और कांतिमय हो गया। इसी रूप में वे मां महागौरी कहलाईं।

    🌼 मां महागौरी की पूजा विधि

    नवरात्रि के आठवें दिन भक्त मां महागौरी की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें।मां की प्रतिमा या चित्र को श्वेत वस्त्र, फूल और अक्षत से सजाएं।मां को सफेद फूल, नारियल और मिश्री का भोग लगाएं।”ॐ देवी महागौर्यै नमः” मंत्र का जप करें।कन्या पूजन करना इस दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।

    🌟 मां महागौरी के पूजन का महत्व

    मां महागौरी की कृपा से जीवन की कठिनाइयाँ दूर होती हैं।दांपत्य जीवन में सुख-शांति और प्रेम बढ़ता है।पाप नष्ट होते हैं और मन शुद्ध होता है।भक्तों को धन, ऐश्वर्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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  • काल से जो रक्षा करे वो माता कालरात्रि : नवरात्रि के सातवें दिन की आराध्या देवी

    मां कालरात्रि को नवरात्रि के सातवें दिन पूजा जाता है। ये देवी दुर्गा का सातवाँ स्वरूप हैं और अंधकार व नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाली शक्ति के रूप में जानी जाती हैं। मां कालरात्रि का नाम सुनते ही मन में भय का भाव उत्पन्न होता है, लेकिन भक्तों के लिए यह स्वरूप कल्याणकारी है, इसलिए इन्हें “शुभंकरी” भी कहा जाता है।

    मां कालरात्रि का स्वरूप

    मां कालरात्रि का शरीर श्यामवर्ण है।इनके बाल खुले रहते हैं और गले में माला शोभायमान होती है।इनके तीन नेत्र हैं जो ब्रह्मांड के समान चमकते हैं।मां का वाहन गधा है।इनके दाहिने हाथ वर और अभय मुद्रा में हैं जबकि बाएँ हाथ में खड्ग और लोहे का कांटा है।

    मां कालरात्रि की पूजा विधि

    नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा विशेष फलदायी होती है।

    1. सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

    2. मां कालरात्रि की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएँ।

    3. लाल फूल, गुड़ और धूप अर्पित करें।

    4. “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” मंत्र का जाप करें।

    5. अंत में मां से भय, रोग और शत्रु बाधा निवारण की प्रार्थना करें।

    मां कालरात्रि की महिमा और महत्व

    मां कालरात्रि की पूजा से शत्रुओं का नाश होता है।जीवन के सभी प्रकार के भय और अकाल मृत्यु से रक्षा मिलती है।नकारात्मक ऊर्जा, ग्रहदोष और बाधाएँ दूर होती हैं।मां कालरात्रि की कृपा से स्वास्थ्य, धन और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

    मां कालरात्रि से जुड़ी कथा

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, असुरों के आतंक से देवता और मनुष्य त्रस्त हो गए थे। तब मां दुर्गा ने अपना भयानक रूप धारण किया और कालरात्रि के रूप में राक्षसों का संहार किया। यही कारण है कि भक्त इस दिन मां की आराधना कर जीवन से अंधकार को दूर करने का आशीर्वाद मांगते हैं।

    निष्कर्ष

    मां कालरात्रि नवरात्रि के सातवें दिन की देवी हैं जो भय और अज्ञान का नाश करके भक्तों को सुख और शांति प्रदान करती हैं। इनकी पूजा से आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवन से सभी प्रकार की बाधाएँ दूर हो जाती हैं।

  • ढिंगू माता मंदिर संजौली – शिमला का प्राचीन धार्मिक स्थल

    हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला अपनी प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक मान्यताओं और आध्यात्मिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ स्थित ढिंगू माता मंदिर संजौली (Dhingu Mata Mandir Sanjauli) भक्तों के लिए आस्था का केंद्र माना जाता है। यह मंदिर माँ दुर्गा के शक्तिरूप को समर्पित है और हर साल हजारों श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं।

    ढिंगू माता मंदिर का इतिहास

    ढिंगू माता मंदिर का इतिहास कई शताब्दियों पुराना माना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार माता ने इस स्थान पर अपनी दिव्य शक्ति का आभास कराया था। तभी से यहाँ भव्य मंदिर का निर्माण हुआ और आज यह मंदिर शिमला के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है।

    धार्मिक महत्व

    नवरात्रि में विशेष पूजा: नवरात्रों के दौरान मंदिर में विशेष पूजा-पाठ और भंडारे का आयोजन किया जाता है।मनोकामना पूर्ण करने वाली देवी: माता ढिंगू के दर्शन से भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।स्थानीय आस्था: संजौली और आसपास के क्षेत्र के लोग हर शुभ कार्य से पहले यहाँ आकर माता के आशीर्वाद लेते हैं।

    ढिंगू माता मंदिर की विशेषताएँ

    1. मंदिर शिमला की ऊँची पहाड़ियों पर स्थित है, जहाँ से शहर का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।

    2. मंदिर परिसर स्वच्छ, शांत और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर है।

    3. प्रतिदिन सुबह और शाम भव्य आरती का आयोजन होता है।

    4. त्योहारों और विशेष अवसरों पर यहाँ धार्मिक मेलों का आयोजन किया जाता है।

    ढिंगू माता मंदिर तक कैसे पहुँचे?

    स्थान: संजौली, शिमला, हिमाचल प्रदेशदूरी: शिमला बस स्टैंड से लगभग 7 किलोमीटरकैसे जाएँ:लोकल बस, टैक्सी और निजी वाहन से आसानी से मंदिर तक पहुँचा जा सकता है।पैदल ट्रैकिंग का भी अनुभव भक्तों को यहाँ की प्राकृतिक खूबसूरती से जोड़ता है।

    मंदिर यात्रा का अनुभव

    मंदिर में प्रवेश करते ही भक्त घंटियों की मधुर ध्वनि और अगरबत्ती की सुगंध से आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं। यहाँ का वातावरण हर यात्री को भक्ति और श्रद्धा में डूबो देता है।

    निष्कर्ष

    ढिंगू माता मंदिर संजौली (Dhingu Mata Mandir Sanjauli) शिमला का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है, जो श्रद्धा, शांति और भक्ति का अद्वितीय संगम है। यदि आप शिमला घूमने आएं तो इस पवित्र स्थान के दर्शन अवश्य करें और माता का आशीर्वाद प्राप्त करें।

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  • मां कात्यायनी: ऋषि कात्यायन की तपस्या का प्रसाद/छठे दिन की पूजा का महत्व/मां कात्यायनी

    नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है। मां दुर्गा का यह छठा रूप अत्यंत शक्तिशाली और करुणामयी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऋषि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर मां दुर्गा ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और उन्हें कात्यायनी कहा गया।

    मां कात्यायनी का स्वरूप

    मां कात्यायनी सिंह पर विराजमान रहती हैं और चार भुजाओं वाली हैं। उनके दाहिने हाथ में कमल पुष्प और तलवार तथा बाएं हाथ में अभयमुद्रा और वरमुद्रा होती है। यह स्वरूप वीरता और शौर्य का प्रतीक है।

    मां कात्यायनी की पूजा विधि

    प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

    मां कात्यायनी की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक और धूप जलाएं।

    लाल फूल, लाल चुनरी और गुड़हल का भोग अर्पित करें।

    दुर्गा सप्तशती के श्लोक और मां कात्यायनी के मंत्र का जाप करें:

    “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॐ कात्यायन्यै नमः”

    मां कात्यायनी का महत्व

    मां कात्यायनी को अविवाहित कन्याओं की अराध्य देवी माना जाता है।

    कहा जाता है कि इनके पूजन से योग्य वर की प्राप्ति होती है।

    भक्तों के जीवन से भय और रोग दूर होते हैं।

    घर-परिवार में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।

    मां कात्यायनी से जुड़ी मान्यता

    माना जाता है कि राक्षस महिषासुर का वध करने के लिए ही मां दुर्गा ने कात्यायनी रूप धारण किया था। इसलिए इन्हें असुर संहारिणी देवी भी कहा जाता है।

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  • माँ बगलामुखी – संकट नाशिनी और विजय प्रदायिनी

    माँ बगलामुखी हिंदू धर्म की दस महाविद्याओं में आठवीं विद्या मानी जाती हैं। इन्हें संकटों को दूर करने वाली और शत्रुओं का नाश करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। “बगलामुखी” का अर्थ है – वाणी और शत्रुओं को स्थिर कर देना। माँ की कृपा से साधक को हर प्रकार के विवाद, मुकदमे, और शत्रु बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

    माँ बगलामुखी का स्वरूप

    माँ पीतवर्णा (पीले रंग की) हैं और पीले वस्त्र धारण करती हैं। इनके एक हाथ में गदा है और दूसरे हाथ से वे शत्रु की जिह्वा पकड़ती हैं। माँ का यह रूप दर्शाता है कि वे दुष्ट और असत्य पर अंकुश लगाकर धर्म और सत्य की रक्षा करती हैं।

    माँ बगलामुखी की पूजा का महत्व

    शत्रु और बाधाओं से मुक्ति दिलाती हैं।कोर्ट-कचहरी, वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है।व्यवसाय और नौकरी में आने वाली अड़चनें दूर होती हैं।मानसिक शांति और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है।

    पूजा विधि

    प्रातः स्नान कर पीले वस्त्र पहनें।

    माँ बगलामुखी की प्रतिमा या चित्र पर हल्दी, पीले पुष्प और पीले वस्त्र अर्पित करें।”ॐ ह्लीं बगलामुख्यै नमः” मंत्र का जाप करें।प्रसाद के रूप में बेसन के लड्डू या चने की दाल अर्पित करना शुभ माना जाता है।

    माँ बगलामुखी की कथा

    पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब पृथ्वी पर दैत्य अत्याचार करने लगे, तब भगवान विष्णु ने माँ बगलामुखी की आराधना की। माँ प्रकट होकर उन्होंने दैत्यों का नाश किया और धर्म की रक्षा की। तभी से भक्तजन उन्हें संकट निवारिणी और विजय प्रदायिनी मानकर पूजा करते हैं।

    निष्कर्ष

    माँ बगलामुखी शक्ति, साहस और विजय की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी आराधना से भक्त का जीवन भय और शत्रु बाधाओं से मुक्त होता है। जो साधक सच्चे मन से माँ की पूजा करते हैं, उनके जीवन में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है।

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  • माँ स्कन्दमाता – पंचम स्वरूप की आराधना

    नवरात्रि के पाँचवे दिन माँ स्कन्दमाता की पूजा की जाती है।

    माँ दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों को शांति, सुख और समृद्धि प्रदान करता है।

    “स्कन्द” शब्द का अर्थ है भगवान कार्तिकेय और “माता” का अर्थ है उनकी जननी।

    अतः इन्हें भगवान कार्तिकेय की माता के रूप में पूजा जाता है।

    माँ स्कन्दमाता का स्वरूप

    माँ स्कन्दमाता चार भुजाओं वाली देवी हैं।

    इनके एक हाथ में कमल का पुष्प, दूसरे हाथ में वरमुद्रा तथा दोनों भुजाओं में बाल रूप कार्तिकेय को धारण करती हैं।

    माँ सिंह पर सवार रहती हैं और इन्हें “पद्मासना देवी” भी कहा जाता है।

    इनका तेज दिव्य और अलौकिक है।

    पूजा का महत्व

    माँ स्कन्दमाता की आराधना करने से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों फल प्राप्त होते हैं।

    जो भक्त पूरी श्रद्धा और भक्ति से पूजा करते हैं, उनके जीवन से भय और दुख दूर हो जाते हैं।

    माँ की कृपा से संतान सुख की प्राप्ति भी होती है और परिवार में खुशहाली आती है।

    पूजा विधि

    प्रातः स्नान कर माँ स्कन्दमाता की प्रतिमा या चित्र के सामने आसन लगाएँ।

    पीले या सफेद पुष्प, फल और प्रसाद अर्पित करें।”

    ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः” मंत्र का जाप करें।

    धूप-दीप जलाकर माता से सुख-समृद्धि और ज्ञान की कामना करें।

    माँ स्कन्दमाता की कथा

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    पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब राक्षसों से देवता परेशान हुए, तब भगवान शिव और पार्वती के पुत्र स्कन्द (कार्तिकेय) ने देवताओं की सेना का नेतृत्व किया और तारकासुर नामक दैत्य का वध किया। उसी समय माता पार्वती को स्कन्दमाता के नाम से जाना गया।

    निष्कर्ष

    माँ स्कन्दमाता करुणामयी और पालनहार हैं।

    उनकी पूजा से भक्त के जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है।

    नवरात्रि में पंचम दिन माँ की आराधना करके भक्त न केवल आध्यात्मिक शांति प्राप्त करते हैं बल्कि सांसारिक सुख-संपत्ति से भी परिपूर्ण हो जाते हैं।

  • माँ ज्वाला जी मंदिर – शक्तिपीठ का अद्भुत चमत्कार जहां स्वयं जोत जलती है बिना किसी तेल घी के साक्षात जमीन से प्रकट होती हैं देवी ज्वाला

    भारत को “देवभूमि” कहा जाता है क्योंकि यहाँ अनगिनत देवालय और पवित्र धाम स्थित हैं। इन्हीं में से एक है माँ ज्वाला जी मंदिर, जो हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित है। यह मंदिर हिंदू धर्म के 51 शक्तिपीठों में से एक प्रमुख शक्तिपीठ माना जाता है। माँ ज्वाला जी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि धरती से प्रकट होने वाली अनादि ज्वालाओं को ही माँ का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। यही कारण है कि यह धाम आस्था, श्रद्धा और चमत्कार का केंद्र माना जाता है।

    पौराणिक कथा और इतिहास

    पौराणिक मान्यता के अनुसार जब राजा दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया, तो उनकी पत्नी माता सती ने यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद भगवान शिव शोकाकुल होकर माता सती के शरीर को लेकर पूरे ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। उस समय भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंड-खंड किया। जहाँ-जहाँ उनके अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई।

    कहा जाता है कि माता सती की जिह्वा कांगड़ा की इस पावन भूमि पर गिरी थी। तभी से यहाँ ज्वालाएँ प्रकट हुईं और यह स्थान माँ ज्वाला जी शक्तिपीठ कहलाया। यह ज्योतियाँ सदियों से बिना किसी घी, तेल या अन्य ईंधन के जल रही हैं। विज्ञान इन्हें प्राकृतिक गैस मानता है, लेकिन आस्था के अनुसार यह माँ ज्वाला जी का दिव्य चमत्कार है।

    नौ ज्योतियों का महत्व

    माँ ज्वाला जी मंदिर में नौ ज्योतियाँ निरंतर प्रज्वलित रहती हैं। प्रत्येक ज्योति को एक देवी का स्वरूप माना जाता है। इनके नाम इस प्रकार हैं –

    महाकाली

    अन्नपूर्णा

    चंडी

    हिंगलाज

    बिंध्यवासिनी

    महालक्ष्मी

    सरस्वती

    अम्बिका

    अंजना

    भक्तजन इन सभी ज्योतियों को नमन कर जीवन के हर क्षेत्र में शक्ति, ज्ञान, समृद्धि और संरक्षण की कामना करते हैं।

    मंदिर की वास्तुकला

    माँ ज्वाला जी मंदिर का निर्माण प्राचीन भारतीय शैली में हुआ है। मंदिर में एक विशाल द्वार, भव्य प्रांगण और गर्भगृह है, जहाँ ये ज्वालाएँ प्रकट होती हैं। गर्भगृह में पत्थरों से घिरी हुई दरारों के बीच से ज्वालाएँ निकलती हैं। यह दृश्य भक्तों को अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव कराता है।

    मंदिर में एक स्वर्ण कलश भी स्थित है, जो भक्तों की श्रद्धा का केंद्र है। मंदिर की दीवारों पर की गई कलाकृतियाँ और नक्काशी इसे और भी आकर्षक बनाती हैं।

    पूजा-अर्चना और नवरात्रि का महत्व

    माँ ज्वाला जी के दरबार में प्रतिदिन विशेष पूजा-अर्चना और आरती होती है। भक्त नारियल, चुनरी, फूल, प्रसाद और दीप अर्पित करते हैं। माँ ज्वाला जी को नारियल विशेष रूप से प्रिय माना जाता है।

    नवरात्रि के समय यहाँ विशेष मेले का आयोजन होता है। चैत्र और आश्विन नवरात्रि में लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से यहाँ पहुँचते हैं। भक्त मानते हैं कि माँ ज्वाला जी का आशीर्वाद मिलने से जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

    माँ ज्वाला जी का चमत्कार

    माँ ज्वाला जी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ की ज्वालाएँ सदियों से लगातार प्रज्वलित हैं। कई बार इन्हें बुझाने का प्रयास किया गया, लेकिन हर बार यह पुनः प्रज्वलित हो उठीं। मुगल शासक अकबर ने भी इन ज्योतियों को बुझाने का प्रयास किया था, किंतु असफल रहा। इसके बाद उसने मंदिर में स्वर्ण छत चढ़वाई और माँ को नमन किया।

    यह अद्भुत चमत्कार आज भी माँ की शक्ति का प्रमाण है। यही कारण है कि माँ ज्वाला जी को “जगदंबा की जीवंत शक्ति” कहा जाता है।

    कैसे पहुँचे माँ ज्वाला जी मंदिर?

    माँ ज्वाला जी मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित है। यहाँ पहुँचने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन ज्वालामुखी रोड है, जो मंदिर से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर है। निकटतम हवाई अड्डा गग्गल एयरपोर्ट (कांगड़ा) है। सड़कों द्वारा भी यह मंदिर शिमला, धर्मशाला, चंडीगढ़ और दिल्ली से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

    पर्यटन और धार्मिक महत्व

    माँ ज्वाला जी मंदिर केवल एक धार्मिक धाम ही नहीं, बल्कि एक प्रमुख पर्यटन स्थल भी है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक सुंदरता का भी आनंद लेते हैं। मंदिर के आसपास कई अन्य देवी-देवताओं के मंदिर भी स्थित हैं, जिन्हें श्रद्धालु अपनी यात्रा में शामिल करते हैं।

    निष्कर्ष

    माँ ज्वाला जी मंदिर भारत के उन शक्तिपीठों में से है जहाँ आस्था और चमत्कार का संगम होता है। सदियों से जल रही इन ज्वालाओं ने भक्तों का विश्वास और भक्ति और गहरा किया है। माँ ज्वाला जी की आराधना से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मबल, सुख और समृद्धि का संचार होता है।

    यदि आप धार्मिक यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो हिमाचल प्रदेश स्थित माँ ज्वाला जी मंदिर अवश्य जाएँ और इस दिव्य चमत्कार के साक्षी बनें ।

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  • माँ कूष्माण्डा – सृष्टि की आदिशक्ति

    नवरात्रि के चौथे दिन की आराध्य देवी हैं माँ कूष्माण्डा। उनके नाम का अर्थ है – कु यानी छोटा, उष्मा यानी ऊर्जा और अंड यानी ब्रह्मांड। माना जाता है कि माँ कूष्माण्डा ने अपनी दिव्य मुस्कान से पूरे ब्रह्मांड की रचना की थी, इसलिए उन्हें सृष्टि की जननी कहा जाता है।

    माँ कूष्माण्डा को अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है क्योंकि उनके आठ हाथ हैं। वे अपने हाथों में धनुष, बाण, कमंडल, अमृत कलश, चक्र, गदा, जपमाला और कमल धारण करती हैं। माँ का वाहन शेर है जो पराक्रम और निर्भयता का प्रतीक है।

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब सम्पूर्ण ब्रह्मांड अंधकारमय था, तब माँ कूष्माण्डा ने अपनी तेजस्वी हँसी से सृष्टि की उत्पत्ति की। वे जीवन, ऊर्जा और प्रकाश की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी उपासना से रोग, शोक और नकारात्मकता दूर होती है तथा स्वास्थ्य, समृद्धि और आत्मबल की प्राप्ति होती है।

    नवरात्रि में भक्त माँ को सफ़ेद कद्दू (कूष्माण्ड), मल्लपुए और पुष्प अर्पित करते हैं। माँ के मंत्रों का जाप और आरती करने से आयु, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक शक्ति की वृद्धि होती है।

    माँ कूष्माण्डा को सृष्टि की आधार शक्ति और जीवनदायिनी देवी माना जाता है। उनकी कृपा से भक्तों का जीवन ऊर्जा और सकारात्मकता से भर जाता है।

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  • SHIMLA : A Complete Travel Guide to the Queen of Hills

    Shimla, the capital of Himachal Pradesh, is one of the most famous hill stations in India. Known as the Queen of Hills, Shimla attracts thousands of tourists every year with its pleasant climate, snow-clad mountains, and colonial architecture. Nestled at an altitude of 2,200 meters, Shimla is a perfect destination for nature lovers, honeymooners, and adventure seekers.

    Some of the best places to visit in Shimla include Mall Road, Ridge, Jakhu Temple, Christ Church, Kufri, Chadwick Falls, and Summer Hill. The Kalka-Shimla toy train, a UNESCO World Heritage Site, offers a breathtaking journey through pine forests, valleys, and tunnels. For adventure enthusiasts, Shimla offers trekking, camping, skiing, and ice-skating experiences.

    Shimla tourism is not just about natural beauty; it also showcases rich Himachali culture and local handicrafts. Tourists can shop for woolens, wooden artifacts, and traditional jewelry at Lakkar Bazaar and Mall Road. The town is also famous for its apple orchards and delicious Himachali cuisine.

    The best time to visit Shimla is from March to June for a summer retreat and December to February for enjoying snowfall. With its charm, culture, and adventure, Shimla is truly a must-visit destination in North India

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  • नवरात्रि का तीसरा दिन – माँ चंद्रघंटा की पूजा, महत्व और कथा

    नवरात्रि का तीसरा दिन माँ चंद्रघंटा को समर्पित होता है। माँ दुर्गा का यह तीसरा स्वरूप शक्ति, साहस और शांति का प्रतीक माना जाता है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र विराजमान है, जिसके कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। इनकी आराधना से भक्त के जीवन में साहस, शांति और समृद्धि का संचार होता है।.

    माँ चंद्रघंटा का स्वरूप

    माँ चंद्रघंटा का वाहन सिंह है, जो वीरता और निर्भयता का प्रतीक है। माँ के पास दस भुजाएँ हैं, जिनमें त्रिशूल, तलवार, गदा, धनुष-बाण, कमल व अन्य दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं। एक हाथ हमेशा अभय मुद्रा में रहता है। इनके मस्तक पर सुशोभित चंद्राकार घंटे की ध्वनि से समस्त नकारात्मक शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं

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    माँ चंद्रघंटा की पूजा का महत्व

    माँ चंद्रघंटा की आराधना से जीवन में आने वाली सभी विघ्न-बाधाएँ दूर होती हैं।

    इनकी कृपा से शांति और साहस प्राप्त होता है।

    माँ का आशीर्वाद वैवाहिक जीवन को सुखी बनाता है।

    इनके घंटे की दिव्य ध्वनि से भूत-प्रेत और नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है।

    तीसरे दिन का महत्व

    नवरात्रि का तीसरा दिन साहस और शांति का प्रतीक है। इस दिन उपवास और माँ की आराधना करने से जीवन की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

    निष्कर्ष

    नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा से भक्त को धन, वैभव और शक्ति की प्राप्ति होती है। माँ का आशीर्वाद जीवन को सुख-समृद्धि से भर देता है और भक्त निर्भय होकर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है।

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