हिमाचल प्रदेश अपनी देव संस्कृति और प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इन्हीं में से एक है गवास मंदिर, जहाँ प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली शांटाड़ी पूजा श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखती है। यह पूजा क्षेत्र की सुख-शांति, समृद्धि और प्राकृतिक संतुलन के लिए की जाती है।
गवास मंदिर का संक्षिप्त परिचय

गवास मंदिर स्थानीय देवी-देवताओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। दूर-दूर से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।
शांटाड़ी पूजा क्या है?

शांटाड़ी पूजा एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में
शांति बनाए रखना
प्राकृतिक आपदाओं से रक्षारोग,
कष्ट और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति
देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करना
शांटाड़ी पूजा का धार्मिक महत्व

शांटाड़ी पूजा को देव शांति अनुष्ठान भी कहा जाता है। इस पूजा में देवताओं का आह्वान कर उन्हें प्रसन्न किया जाता है ताकि:
फसल अच्छी हो
वर्षा संतुलित रहे
परिवार और समाज में शांति बनी रहे
यह पूजा पीढ़ियों से चली आ रही लोक परंपरा का हिस्सा है।
माना जाता है कि इस पूजा से गांव और आसपास के क्षेत्र में सुख-समृद्धि आती है।
गवास मंदिर में शांटाड़ी पूजा की विधि

शांटाड़ी पूजा विशेष रीति-रिवाजों के साथ संपन्न होती है:
देवता का आवाहन
पारंपरिक मंत्रोच्चारण
ढोल-नगाड़ों की गूंज
हवन और पूजा-अर्चना
प्रसाद वितरण
शांटाड़ी पूजा का समय और आयोजन

यह पूजा प्रायः विशेष तिथि या देव आज्ञा के अनुसार आयोजित की जाती है।
इसमें:गांव के बुजुर्ग
पुजारी युवा और महिलाएं सभी सामूहिक रूप से भाग लेते हैं।
स्थानीय संस्कृति और लोक आस्था

गवास मंदिर की शांटाड़ी पूजा स्थानीय संस्कृति की आत्मा है। यह पूजा लोगों को जोड़ती है और सामाजिक एकता को मजबूत करती है। लोकगीत, देव नृत्य और पारंपरिक वेशभूषा इस आयोजन को और भी खास बनाते हैं।
क्यों प्रसिद्ध है गवास मंदिर की शांटाड़ी पूजा?

प्राचीन धार्मिक परंपरा
देव संस्कृति से जुड़ा आयोजन
क्षेत्रीय शांति और समृद्धि की कामना
आस्था और विश्वास का प्रतीक
निष्कर्ष
गवास मंदिर की शांटाड़ी पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हिमाचल की देव संस्कृति और लोक आस्था का जीवंत उदाहरण है। यह पूजा लोगों के जीवन में शांति, विश्वास और सकारात्मकता का संचार करती है।
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